Sunday, June 15, 2014

परीक्षा

जाने क्यों ?
सीने से दर्द का सैलाव सा
उठता है ,
कोई है जो मुझे ,
निष्प्राण करने की कोशिश मै
बार -बार हताश हो रहा है ,
मैं , गुरूजी के भीतर
बलात दस्तक देती  जा रही हूँ ,
देख लीजिये !! कोई हमें
नाहक , अविषयक
प्रश्न -पत्रों में उलझा रहा है ,
परीक्षाओं का दौर
संपन्न होता ही है ,
तभी , साक्षात्कार का
पल आ गया ,
हम भी ठहर गए हैं ,
हमारे , आत्मबल , समर्पण , एकत्व
और अपनत्व का इम्तहान
ले ही , लो ,
यूँ , बार -बार ध्यान
भंग करने का
दुराचार मत करो।

रेनू शर्मा १३ /५/१२ 

हम फौलाद फांक रहे हैं

पल -पल रेत का समंदर
मेरे , हाथों के सम्पुट से
सरक रहा है ,
हम , एक -दूसरे को
कनखियों से देखकर
सिहर उठते हैं ,
झट से , रेत को बिखराकर
फिर से ,
अंजुली भर लेती हूँ ,
तुम , हौले -हौले रिसते रहो
हम , सब पुन :
हौसलों का अम्बार लगा देंगे ,
तुम , हमें
झकझोरने का प्रयास मत करो ,
हम , सब
फौलाद फांक रहे हैं
देखो !! हम
आत्मबल उगा रहे हैं ,
तुम , हार जाओगे
हम , एक हो गए हैं।

रेनू शर्मा 

कवच

भीतर भयानक तूफान सा 
उठ रहा था ,
ये , कौन है ? जो 
हमें , झकझोर रहा है ,
तोड़कर , बिखराने का 
प्रयास कर रहा है ,
अभी , तो हम मिले ही थे ,
सब ,कुछ खुशगंवार था 
फिर ,क्यों और कैसे 
किसी ने हमारे नीड से 
तिनका खींचने की 
जुर्रत की ,
सरफ़िरों को नहीं पता ,
हमारे संरक्षक दिव्यात्मा हैं 
हमारी ऊर्जा 
परस्पर मिलकर 
प्रज्वलित हो रही है 
एक , कवच बन गया है ,
अब , लहरें शांत हो चली हैं 
हम घरोंदे के अंदर 
जुगनू सजा रहे हैं। 

रेनू शर्मा 

हवा का झोंका

धड़कनें बेकाबू
हो रहीं थीँ ,
कभी , हौले
कभी , तेज सांसें
सरक रहीं थीँ ,
सिरहाने से बार -बार
बंद पलकें ,
बदहवास सी
फट रहीँ थीँ ,
ये , क्या हो रहा है ?
क्यों , सन्नाटा सा
पसर रहा है ,
हमारे , इर्द -गिर्द
जैसे , कोई अपना
कोई , प्रिय कोई , अज़ीज
हमसे , बलात
छीना जा रहा हो ,
मैं ,बैठ गई , बिफर गई
सुन लो !! तुम !!
हरगिज ऐसा नहीं कर सकते ,
अरे !! हमारे पुर्वजों , देवताओं जागो
कृपा करो ,
तभी , एक शीतल हवा का झोंका
मुझे  ,थपकी दे रहा था।

रेनू शर्मा 

Saturday, May 10, 2014

माँ

माँ  ,
दो राहे पर
खड़ी थी ,
किस राह पर
चल दे ,
समझ नहीं पा
रही थी ,
दूर ```````
अनजान ,वीरानी
राह पर ,जहाँ
छितिज भी
धूमिल था , कोई
घास नहीं , तिनका नहीं
पत्थर और धूल का
गुबार था ,
बच्चा !! भटक रहा था
असमंजस के हालात थे ,
माँ ,
हताश , निराश
भीगी पलकों से
बच्चे को निहार रही थी ,
अावाज दे रही थी
जो , कंठ में कहीं
अटक रही थी ,
हाथ उठा रही थी
रोकने के लिये , लेकिन
लाचार थी , बेबस सी माँ ,
सुबह के धुंधलके में
बिस्तर पर , अवाक् बैठी
भयानक स्वप्न का
मंजर याद कर
सिहर रही थी
रेणु

Thursday, July 4, 2013

अहिल्या सी

तुम ,
शिवालय के 
मंडप में 
मुझे ,खींच रहे थे 
मैं ,बेहताशा ,बाबली सी 
अपना दुपट्टा 
बाहर  ही कहीं ,
गिरा आई थी 
तुमने ,मुझे 
आगोश में लिया और 
कहा ,
मुझसे, दूर मत जाना ,
मेरा , हाथ पकड़ो 
साथ ही रहो ,
कुछ तो , अनहोनी
 होने जा रही थी ,
मेरी ,सांसें 
उखड रहीं थीं ,
तुम ,मेरी आँखों में 
समाते जा रहे थे ,
तुम्हारा चेहरा 
सफ़ेद पड़ गया था 
बाहर से ,लोगों का सैलाव 
मंदिर में घुस रहा था ,
मानो ,
शिव !! ही सबको साध लेंगे ,
बाहर ,घनघोर वर्षा 
हो रही थी ,
लग रहा था ,आज ही 
कृष्ण !!का जन्म 
हो रहा हो ,
तभी ,पलभर में 
हमारे शरीर 
पानी और कीचड़ में 
समाने लगे ,
तुम ,
मेरा हाथ थामे थे ,
मैं ,सैलाव के साथ 
बह रही थी ,
अचानक एक स्तम्भ 
हमारे बीच आ गया ,
तुम्हारा हाथ 
मेरे ,हाथ से छूट गया ,
मैं ,
मूर्छित हो चली थी ,
न , संभल पा रही थी 
न , बह पा रही थी ,
तुम ,मुझे अपलक देखकर 
चीख रहे थे 
मैं ,मंदिर प्रांगन में 
पानी ,मिटटी ,पत्त्थर के 
गारे में 
अहिल्या सी ,
जमती जा रही थी ,
मानो ,किसी विश्वामित्र ने 
शाप दिया हो ,
तभी ,मेरे आँचल से 
कुछ टकराया और 
एक प्रस्तर खंड 
तुम्हें ,मेरे पास 
बहा ले आया ,
हम ,मृतप्राय 
एकदूसरे में समाये थे ,
भूमि में गढ़ गये थे ,
धरती हमें, 
निवाला बना रही थी ,
फिर हम ,आजाद थे 
देख रहे थे ,
जलधारा कैसे ,
हजारों प्राणियों को 
रास्ते  से हटा रही थी ,
शिव के मंदिर में 
महाकाल !!
विकराल बन 
संहार कर रहे थे ,
हम ,बादलों के पार 
अठखेलियाँ कर रहे थे .

रेनू शर्मा 

Tuesday, July 2, 2013

प्रलय

 प्रलय 
कई बार 
कल्पना की थी 
यदि ,
जल प्रलय हुई 
तो , क्या मंजर  होगा ?
एक , अतिकल्पनाशीलता 
हर बार मुझे ,
प्रलय लीलाओं की ओर 
 धकेलती थी ,
जब ,तस्वीर बनती थी 
तब ,
रूह तक कांप जाती थी 
लगता था ,कि 
नहीं ,ऐसा नहीं हो सकता ,
लेकिन ,
जब ,उत्तराखंड की 
त्रासदी का बीभत्स दृश्य देखा 
तब ,
अचम्भित हो गई 
जैसे ,सबकुछ 
दोहराया जा रहा था ,
लोग तिनकों के समान 
जलधारा में बह रहे थे ,
घर ,दुकान ,मकान 
मंदिर ,शिवालय सब 
खंड -खंड हो ,
रेत के घरोंदों से 
बिखर रहे थे ,
पहाड़ ,चट्टानें ,मिटटी 
सब ,नदी बनकर 
बह रहे थे ,
भयंकर हुंकार भरती नदियाँ 
बिकराल राक्षसी सी 
चीत्कार रहीं थीं 
बचे -खुचे इन्सान 
इधर -उधर भाग रहे थे ,
बच्चे ,बूढ़े ,नौजवान 
औरत ,बेटियां सब 
जहाँ -तहां बिलख 
रहे थे ,
कोई तो ,मसीहा आये 
उन्हें बचाए ,
ईश्वर !!भी मौन ,स्तब्ध निरुत्तर सा 
निराकार होकर 
भुमिदोज हो गया था ,
मानो ,कहना चाहता हो 
देखो !!मैं ,भी बेबस हूँ ,
भयानक वीरानी 
 वादियों में ,
पसर रही थी ,
कहीं ,दरिया धरती का 
सीना चीरकर,उदंडता से 
बह रहा था ,
कहीं ,धरती स्वयं 
अपने भीतर समां रही थी ,
कहीं ,प्रस्तर खंड 
बेकाबू होकर बेतरतीब 
खंड -खंड हो 
शिव पिंड बन रहे थे ,
मानव ,इस प्रचंड प्रलय के 
आगोश में विलयित हो 
पुन:जीवन पाने को 
ललाइत हो रहे थे ,
पशु -पक्षी ,जानवर 
कीड़े ,मकोड़े सब 
धारा के प्रवाह में 
कण -कण बंटकर 
धूल बन रहे थे ,
मैं ,तो ,यूँ ही 
कल्पना कर बैठी थी 
जब ,साकार हुई तो ,
मूंक-बधिर सी 
स्पंदन हीन सी 
ठगी की ठगी 
रह गई .


रेनू शर्मा २८ .६.२०१३