ब्रज की हवाओं से
कुञ्ज गलियों का ,
पता पूछती
मेरी निगाहें ,
थक सी रहीं हैं ।
आम के बौर ,
नीम के फूल की सुगंध ,
सरसराकर
मेरा मस्तिस्क ,
झकझोर रहे हैं ।
हौले से पुकार कर
लुका -छुपी खेल रहे हैं ।
महुआ गदरा रहा है ,
टेसू के फूल ,
बिखर रहे हैं बगिया में।
मेरी रूह , लौट रही है
उपवन में ,
धीरे से कोई धप्पी देकर
भाग रहा है ।
पलाश जल रहा है
होली की आग सा ।
नन्हीं कलियाँ हंस रही है
बाटिका में ।
मैं , खिंच रहा हूँ , तेजी से
कुञ्ज गलियों मैं ।
मोहपाश के रंग मैं बांधकर
मुझे , डुबो रहा है कोई
ब्रज की हवाएं दूर खडीं
चिडा रहीं हैं मुझे ।
रेनू ......
Monday, March 16, 2009
आस

कहकहे बटोरती
तिलिस्म बिखराती ,
आईने में जिंदगी
निहारती ,
काँटों को सवांरती ,
फूलों को सहेजती
सूखे पत्तों को
समेटती ,
बादलों में छुपाती ,
हवाओं के साथ उड़ती
मौसम सी बदलती ,
कभी ,
संगीत सी बजती
स्त्री ,
कठपुतली सी ।
पुरूष के बनाये
रंग मंच पर फुदकती है ।
मानो ,
टांग दी गई हो
खूँटी पर ,
बंधन खुलने की
आस में ।
रेनू ...
सुबक रहा है

टेसू फूलकर
लाल हो गया है ,
पतझड़ थमता नही ,
बसंत रुकता नहीं
बादल घुमड़ते हैं ,
झमाझम बरसते हैं
पर , इस बार
फागुन ,
रंगता नही ।
खामोश है
तन और मन ,
ख्वाबों का सैलाव
दरक सा रहा है ।
वजूद
मिटने की
छटपटाहट है ।
हर रोज झाड़ रहे हैं ,
पत्तों की तरह
उमंगों के फूल ,
खंडहर सी खड़ी हूँ
मेरे हौसले सा ,
बसंत ,
सुबक रहा है ।
रेनू ....
Saturday, March 14, 2009
टूटना मत
जब , छोटी थी तब ,
मदमस्त , बेखबर
तितली सी ,
कभी इधर
कभी उधर ,
मंडराती थी ।
कभी भाई से लड़ना ,
सखी से मिलना ,
माँ से उलझना ,
पिता से अटकना
सब ,
बेलगाम चलता था ।
अब , जब , पीहर
पीछे छूट गया है ,
तब ,
माँ , कहती है -
वे ही तुम्हारे माता -पिता हैं
पिता कहते हैं -
वही तुम्हारा घर है ,
भाई कहता है -
टूटना मत ,
सखी कहती है -
बिखरना मत ,
मैं , कहती हूँ -
मुझे पहले बताया होता ,
क्या , नही करना ।
क्यों ?
मैं , फ़िर से
बेटी नही बन सकती ।
रेनू ....
Tuesday, March 10, 2009
रंग सा बरस रहा है

हवाओं से
बात करती
गति ,
मनो रेस
खेल रही है ।
नदी , झरने
ताल , तलैया
पेड , पौधे
सब ,
दौड़ रहे हैं
साथ -साथ ।
यह , दृष्टि भ्रम है
मैं , जानती हूँ ।
मेरे रुकते ही
सब ,
थम जाते हैं ।
मैं , बहक रही हूँ ।
दूर फिजाओं में
बादल घुमड़ रहे हैं
रंग सा बरस रहा है ,
भीतर बैठी में ,
अन्दर तक
भींग रही हूँ ।
क्षितिज लापता सा
हो रहा है ।
मेरे पास ही प्रकृति
कहकहे लगा रही है
मनो ,
संगीत छेड़ दिया हो ,
गति थम गई है ।
रंग सा बरस रहा है
हमारे आस -पास ।
रेनू शर्मा .......
Friday, March 6, 2009
इनका दिवस
रोज़ की तरह
आज भी, वे
महिला दिवस
मन रही हैं
कभी,
गहने खरीद रही हैं
कभी साड़ी।
सहेली के साथ
सिनेमा जाने का
मन बना रही हैं,
साहब का लंच
बहार ही होगा
इसलिए,
स्वयं पिज्जा खा रही हैं।
बड़ी आसानी से
झिड़क देती हैं
फुटपाथ पर
भीख मांगती
औरत को
ये आधुनिक महिला
अपने अस्तित्व को
भुना रही हैं
तभी तो
शेहेर भर की
सड़कों पर
इनकी गाड़ी
सरपट दौड़ रही है।
रेनू...
महिला दिवस
Wednesday, 4 March 2009
कैसा महिला दिवस ?
वो ,
तडके सवेरे ,
बटोरी लकडियों से
चूल्हा जला ,
रोटियां सेक
हाथ में ,
श्रमिक वाला
थैला पकड़ ,
नंगे पैर
चिलचिलाती धूप में
सड़क पर
दौड़ रही थी ।
पीठ की झोली में
बेटी को ,
बाँध लिया है
अपने भाग्य सा ,
किसी दरख्त के साये में
झुला देगी उसे ,
मीठे सपनों की नींद
और
जुट जायेगी
फावडा , गैंती
लेकर
अपने कर्म खोदने ।
जब ,
सिमट जाएगा दिन
तब ,
अल्प फल के साथ
दौड़ पड़ेगी
आशियाने की तरफ़ ,
क्योंकि
मर्द ,
उसके महिलातत्व का
स्वागत करने
विकल बैठा है ।
धुनी हुई रुई सी
तार -तार होकर
फ़िर से ,
महिला मजदूर की
पंक्ति में समाहित
हो लेगी ।
जिन्दगी यूँ ही
तमाम कर देगी
एक महिला ।
रेनू ......
कैसा महिला दिवस ?
वो ,
तडके सवेरे ,
बटोरी लकडियों से
चूल्हा जला ,
रोटियां सेक
हाथ में ,
श्रमिक वाला
थैला पकड़ ,
नंगे पैर
चिलचिलाती धूप में
सड़क पर
दौड़ रही थी ।
पीठ की झोली में
बेटी को ,
बाँध लिया है
अपने भाग्य सा ,
किसी दरख्त के साये में
झुला देगी उसे ,
मीठे सपनों की नींद
और
जुट जायेगी
फावडा , गैंती
लेकर
अपने कर्म खोदने ।
जब ,
सिमट जाएगा दिन
तब ,
अल्प फल के साथ
दौड़ पड़ेगी
आशियाने की तरफ़ ,
क्योंकि
मर्द ,
उसके महिलातत्व का
स्वागत करने
विकल बैठा है ।
धुनी हुई रुई सी
तार -तार होकर
फ़िर से ,
महिला मजदूर की
पंक्ति में समाहित
हो लेगी ।
जिन्दगी यूँ ही
तमाम कर देगी
एक महिला ।
रेनू ......
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